मध्यस्थ पद्मश्री धर्मपाल सैनी ने बतलाया, नक्सलियों ने नही रखी कोई शर्त,माओवादियों ने कहा राकेश्वर जब परिवार के पास पहुंचे तो हमें एक तस्वीर दिखा देना

 

वतन जायसवाल

रायपुर। कोबरा कमांडो की रिहाई में महती भूमिका निभाने वाले 91 वर्षीय धर्मपाल सैनी की चर्चा देश में हो रही है। बड़ी सरलता से चंद घँटे की मुलाकात में ही उन्होंने माओवादियों को मना लिया वो भी बिना किसी शर्त के। 

   पद्मश्री श्री सैनी ने बताया कि नक्सलियों ने जवान को छोड़ने के लिए किसी भी प्रकार की कोई शर्त नहीं रखी थी। बस उन्होंने यह कहा कि जब जवान अपने परिवार के बीच पहुंच जाए तो उन्हें उसकी एक तस्वीर चाहिए। नक्सलियों ने उनसे यह भी कहा कि हम जवान को सकुशल छोड़ रहे हैं, लेकिन सरकार को भी चाहिए कि नक्सल मामलों में वर्षों से जेलों में बंद आदिवासियों को छोड़ने पर विचार किया जाए। 

श्री सैनी ने जानकारी दी कि नक्सलियों द्वारा लगाए गए जन अदालत में 13 साल से 28 साल तक के युवा अधिक थे। आसपास के 20 गांव के लोग इस जन अदालत में बुलाए गए थे। उनके सामने ही सभी लोगों से महिला नक्सली कमांडर ने जवान को छोड़े जाने की पेशकश की। 

  "बस्तर का गांधी" या "ताऊ जी" के नाम से है विख्यात

"बस्तर का गांधी" या "ताऊ जी" इसी नाम से पुकारता है उन्हें पूरा इलाक़ा। मूलतःमध्यप्रदेश के धार जिले से के रहने वाले थे पर 1976 में बस्तर आए और यही के होकर रह गए। वे आचार्य विनोबा भावे के शिष्य थे। उनकी आज्ञा से ही वो बस्तर आए। पर इसके लिए उन्हें विनोबा भावे जी से बहुत विनती करनी पड़ी। आख़िरकार धर्मपाल जी के हठ के आगे आचार्य विनोबा भावे  को झुकना पड़ा लेकिन उन्होंने भी शर्त रखी की धर्मपाल को कम से कम 10 साल बस्तर में ही गुजारने होंगे। गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए धर्मपाल  1976 में बस्तर आए और यहीं के होकर रह गए। उनके विद्यार्थी और स्थानीय लोग उन्हें ताऊजी कहकर बुलाते हैं।


अपने समय के कुशल खिलाडी रहे धर्मपाल जी ने  बस्तर में अब तक 2 हजार से ज्यादा खिलाड़ी तैयार किए हैं। वे बताते हैं कि जब वे बस्तर आए तो देखा कि छोटे-छोटे बच्चे भी 15 से 20 किलोमीटर आसानी से चल लेते हैं। बच्चों के इस क्षमता को खेल और शिक्षा में उपयोग करने की बात उन्होंने सोची। 1985 में पहली बार आश्रम की छात्राओं को उन्होंने खेल प्रतिस्पर्धा में उतारा। उन्होंने यहां कि बेटियों की जिंदगी को बदलने का बीड़ा उठाया और आज भी अनवरत चल रहे हैं। कहा जाता है कि 60 के दशक में सैनी जी ने एक अखबार में बस्तर की लड़कियों से जुड़ी एक खबर पढ़ी थी। खबर के अनुसार दशहरा के आयोजन से लौटते वक्त कुछ लड़कियों के साथ कुछ लड़के छेड़छाड़ कर रहे थे। लड़कियों ने उन लड़कों के हाथ-पैर काट कर उनकी हत्या कर दी थी। यह खबर उनके मन में घर कर गई। उन्होंने फैसला लिया कि वे बच्चियों की ऊर्जा को सही स्थान पर लगाएंगे और उन्हें प्रेरित करेंगे।

बीजापुर से गोंडवाना समाज जिला अध्यक्ष और सेवानिवृत शिक्षक तेलम बोरैया जवान राकेश्वर सिंह मनहास को छुड़ाने पद्मश्री धर्मपाल सैनी  के साथ गये थे। उन्होंने बताया कि समाज और जरूरतमंदों के लिए वे हमेशा काम करते हैं। एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें सरकार की तरफ से नक्सलियों से बात करने के लिए चुना।  जिसके बाद वे नक्सलियों से मिलने पहुंचे और उनसे बात कर जवान राकेश्वर सिंह मनहास को रिहा करवाया। तेलम बोरैया ने बताया कि राकेश्वर सिंह की पत्नी व बेटी की अपील व उनके आंसू को देख हमने नक्सलियों के पास जाकर अपील की। जिसके बाद नक्सलियों ने जवान को रिहा किया।

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